हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , माह-ए-रजब की मुनासबत से रहबर-ए-मोअज़्ज़म के बयानात के चुने हुए इक़्तिबासात बंदगी के इन क़ीमती मौक़ों की अहमियत बयान करते हैं।
ग़ाफ़िल दिल शैतान के हमलों का आसान निशाना बन जाता है। जब शैतान इंसान के दिल और जान पर क़ाबू पा लेता है, तो दुनिया में शर और फ़साद फैलता है।
हर तरह के शर और फ़साद का सबसे बेहतर और हक़ीक़ी मुक़ाबला यह है कि इंसान ख़ुदा से मज़बूत रिश्ता बनाए और अपने दिल-ओ-जान को शैतानी असर से महफ़ूज़ रखे।अगर उन लोगों के दिलों पर शैतान का ग़लबा न होता जिनका आलमी समाजों पर बड़ा असर है, तो दुनिया अमन-ओ-सुकून देखती और इंसानियत सलामती और इत्मीनान से फ़ायदा उठाती।
इंसान की तमाम बदक़िस्मतियों की जड़ ख़ुदा से दूरी है। इसी लिए इस्लाम में ख़ुदावंद-ए-मुतआल से ख़ास क़ुरबत के लिए कुछ ख़ास औक़ात मुक़र्रर किए गए हैं।
इन्हीं में से एक माह-ए-रजब है। इस महीने की क़द्र करें। इस माह में पढ़ी जाने वाली तमाम दुआएँ सिर्फ़ ज़बानी अल्फ़ाज़ नहीं, बल्कि तरबियत और हिदायत का पैग़ाम हैं।
इन दुआओं को हुज़ूर-ए-क़ल्ब के साथ, उनके गहरे मआनी को समझते हुए दिल और ज़बान पर जारी करें। अगर मुसलमान जवान हो या बूढ़ा, मर्द हो या औरत माह-ए-रजब और फिर माह-ए-शाबान में ख़ुदा से अपने ताल्लुक़ को साफ़ और क़रीब कर ले, तो वह पूरी तैयारी के साथ माह-ए-रमज़ान में दाख़िल होता है।
तब माह-ए-रमज़ान हक़ीक़ी मआनों में इलाही ज़ियाफ़त का महीना बन जाता है। इंसान को चाहिए कि पहले ख़ुद को तैयार करे, फिर इस ज़ियाफ़त में क़दम रखे।यह पाकीज़गी रजब और शाबान में हासिल की जाए, ताकि रमज़ान में ख़ुदा के दस्तरख़्वान-ए-करम पर हाज़िर होकर उसकी नेमतों और फ़ुयूज़ात से भरपूर फ़ायदा उठाया जा सके।
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